Friday, 9 October 2015

अपनी ही कलम से प्रबीन मुँगटा ... " ये लिजिये आपकी खामोशी को ही फिदरत में बदलूँगा__शायद आपने वो मंज़र नहीं देखा ग़मों में जीने वालों का समंदर नहीं देखा ।।आप मुसाफ़िर तो हैं अपनी मंजिल के । पर बिना मंजिल के मुसाफ़िर को नहीं देखारिश्तों के टूटने का दुःख आप क्या जानो ।आपने शायद रिश्तों के बंधन को ही नहीं देखा।।महल तो खड़े कर लिए आपने शीशे के ।पर शीशे की चमक में खुद को नहीं देखा 🚶ढूंढने निकले थे दीपक की रोशनी को 💫दुनियाँ छान ली पर खुद के अन्दर नहींदेखा✏ हो सकता है गलत लिखती है कलम मेरी पर । कभी मैंने कलम की गलतियों को नहीं देखा ।


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