Saturday, 1 August 2015

प्रबीन मुँगटा ऎक लेखक व वक्ता

मुँगटा उस बारिश का नाम नही जो बरसे और थमजाये। मुँगटा वो सूरज नही है जो चमके और डुब जाये 🌓 मुँगटा नाम है उस सांस का। जो चले तो जिंदगी और थमे तो मौत बन जाये।

मन में आये कुछ अल्फाज़ लिखता हूँ कुछ कम और कुछ बेहिसाब लिखता हूँ उजाड़े गये आशिकों के आशियाने कहीं उजड़ा, वो महोब्बत का ताज लिखता हूँ


प्रबीन मुँगटा एक परिचय


बहुत सारे दोस्त अक्सर मेरे बारे मे जानना चाहते हैं।
और पूछते हैं मैं क्या लिखता हूँ क्या करता हूं ।
तो आज अपने बारे में मैं आप सभी को जानकारी देता हूं । शुरुआत मंच से करता हूं ।
01- कवि सम्मेलनों -ओज कविता पढता हूं ।
02 -मुशायरों - शायरी करता हू ।
हालांकि में आशु कवि हूं लेकिन साथ ही कहानियाँ , उपन्यास , लेख,स्क्रिप्ट भी लिखता हूं । और मैं ये लिखने का काम 7 बर्ष की उम्र से करता हूं।
नाम - प्रबीन मुँगटा
प्रचलित नाम - मुँगटा
ये वो विधा हैं जो मुझे आती हैं ।
विधा -व्यंग्य, वीर रस,
शेर और शायरी, नैतिक कविता, सोम रस,श्रंगार रस, करूणा रस, हास्य रस, नज्म़,भक्ति रसमेरी नई विधा ,तिलिस्म शायरी, चिंता व्यंग्य,श्लोक आदि ।
काव्यपाठ और कवि सम्मेलन"
मैं अल्फाजों से अपने लिऐ मुमताज बना लेता हुँ

खेल कूद में भी सबसे आगे बचपन की यादगार तस्वीर


इनके भाई भी कवि कौशल मुंगटा अपनी कविताओं के 

माध्यम से समाज का दर्द बड़ी बखूबी से पेश कर रहे हैं



हिमाचल प्रदेश के युवा कवि कौशल मुंगटा अपनी कविताओं के माध्यम से समाज का दर्द बड़ी बखूबी से पेश कर रहे हैं ! जिस तीव्रता से युवावस्था में ही उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है वह सचमुच काबिले तारीफ़ है. राजकीय महाविद्यालय संजौली के छात्र एवं हिमाचल प्रदेश के शिमला जिला की जुब्बल तहसील के सोलंग गाँव में पैदा हुए मुन्गटा की कविताओं ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई हैं.. 




पेश है उनकी एक कविता :-
गरीबों को बस रोते देखता हूँ.
जब भी किसी को तडपते देखता हूँ जब भी किसी को बिखरते देखता हूँ कोठियों का मंजर तो सलौना होता है. लेकिन गरीबों को बस रोते देखता हूँ. फुटपाथ पे पड़ी जिन्दगी को खोते देखता हूँ बिन भोजन भूखी आँखों को रोते देखता हूँ ! अमीरों के जाम सोने के, गरीबों के थाल सोने के भूखे नंगे बचपन को गलियों में सोते देखता हूँ ! गरीबों को बस रोते देखता हूँ. ! जब भी गरीबों के चेहरों पर खुशी देखता हूँ अमीरों के चेहरे पर फिर बेबसी देखता हूँ खुशियों को गरीबो की पल भर में खाक करके मरघट के मुख पर मुस्कान देखता हूँ ! गरीबों को बस रोते देखता हूँ ! गरीबों की आँखों में बहती नदी देखता हूँ अपने बचपन को पीस रहा गरीब बचपन देखता हूँ लुटेरों के चेहरों से खूब हूँ मैं वाकिफ बड़े हुए लोगों का बड़प्पन देखता हूँ ! चेहरों को समझकर गुलाब मैनें, बहुत खाए हैं धोखे 'कौशल' अब तो आईना भी नहीं देखता हूँ ! कोठियों का मंजर सलौना होता है लेकिन गरीबों को बस रोते देखता हूँ

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